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प्रकाश और खुशियों का त्योहार

 


दीपावली: प्रकाश और खुशियों का त्योहार

दीपावली, जिसे हम सभी दीपों के त्योहार के रूप में जानते हैं, हर वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का एक अद्भुत उदाहरण है जो प्रकाश, समृद्धि और खुशियों का प्रतीक है। दीपावली का त्योहार न केवल हिन्दू धर्म में, बल्कि अन्य धर्मों में भी विशेष महत्व रखता है।

दीपावली का महत्व

दीपावली का त्योहार भगवान राम की रावण पर विजय की कहानी से जुड़ा हुआ है। जब भगवान राम ने 14 वर्षों का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, तब अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। इसी कारण से इस दिन दीप जलाने की परंपरा है। इसके अलावा, इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जो धन और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं।

पूजा की तैयारी

दीपावली की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती है। घर की सफाई, रंगोली बनाना, और दीपक खरीदना इन तैयारियों का हिस्सा हैं। इस दिन लोग अपने घरों को सजाते हैं और दीयों की रोशनी से जगमगाते हैं।

पूजा विधि

दीपावली की पूजा में विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा के दौरान:

  1. माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की स्थापना करें।
  2. दीप जलाएं और फूल, फल, तथा मिठाई अर्पित करें।
  3. मंत्रों का जाप करें, जैसे "ॐ श्री लक्ष्म्यै नमः"।

पूजा के बाद, प्रसाद का वितरण किया जाता है, जिससे हर कोई उस शुभ दिन का आनंद ले सके।

उत्सव का आनंद

दीपावली केवल पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह एक उत्सव है। लोग पटाखे फोड़ते हैं, मिठाइयाँ बांटते हैं, और एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं। यह समय परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर खुशियाँ मनाने का होता है। नए कपड़े पहनने, मिठाइयाँ बनाने, और एक-दूसरे के साथ मिलकर आनंदित होने का यह अवसर हमारे रिश्तों को और भी मजबूत बनाता है।

समापन

दीपावली का त्योहार हमें अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की प्रेरणा देता है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ हों, हमें सकारात्मकता और आशा के साथ आगे बढ़ना चाहिए। इस दीपावली, चलिए हम सभी मिलकर एक नई रोशनी और खुशियों के साथ इस पर्व का स्वागत करें।

आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ! ✨

दशहरा

 



### दशहरा का त्यौहार: पूर्ण विवरण

**परिचय:**

दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार हर साल अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और यह भारत के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न तरीके से मनाया जाता है।

### ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

दशहरा का मुख्य धार्मिक महत्व भगवान राम और रावण की कथा से जुड़ा हुआ है। हिंदू धर्म में रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है। रामायण के अनुसार, रावण ने सीता का अपहरण किया था, जिसके बाद भगवान राम ने रावण से युद्ध किया। रावण का वध करना भगवान राम की विजय का प्रतीक है।

### दशहरा पूजन

**पूजन विधि:**

1. **स्नान और शुद्धता:**  

   दशहरे की सुबह स्नान करना और स्वच्छ वस्त्र पहनना महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पूजा का पहला चरण होता है।

2. **पूजा सामग्री:**  

   पूजा में निम्नलिखित सामग्री का उपयोग होता है:

   - **फूल:** देवी-देवताओं को अर्पित करने के लिए।

   - **फल:** विशेषकर सेब, नाशपाती और नारियल।

   - **दीपक और धूप:** पूजा की रोशनी और सुगंध के लिए।

   - **नैवेद्य:** मिठाई या अन्य पकवान जो देवी-देवताओं को अर्पित किए जाते हैं।

3. **आरती और भजन:**  

   पूजा के दौरान आरती गाई जाती है और भक्तजन भजन गाते हैं। यह देवी की स्तुति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

### रावण का दहन

**दहन की प्रक्रिया:**

1. **पुतला निर्माण:**  

   दशहरे के दिन, रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के बड़े पुतले बनाए जाते हैं। ये पुतले आमतौर पर कागज, बांस और अन्य सामग्री से बनाए जाते हैं।

2. **दहन का समय:**  

   पुतले का दहन आमतौर पर संध्या समय किया जाता है। इसके पहले रामलीला का आयोजन होता है, जिसमें रावण के साथ भगवान राम के युद्ध का दृश्य दिखाया जाता है।

3. **दहन का महत्व:**  

   रावण का दहन बुराई के अंत और अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली हो, उसका अंत निश्चित है।

### हिन्दू धर्म में विशेषता

- **संस्कृति और परंपरा:**  

  दशहरा भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। यह त्यौहार पारिवारिक एकता, सहयोग और प्रेम का प्रतीक है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर बधाई देते हैं और मिठाइयाँ बांटते हैं।

- **नवसंजीवनी:**  

  दशहरा एक नई शुरुआत का संकेत देता है। लोग इस दिन को सकारात्मकता और नए संकल्प लेने के अवसर के रूप में मानते हैं। यह आत्म-सुधार और अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करने का समय है।

- **कला और सांस्कृतिक उत्सव:**  

  दशहरा के दौरान रामलीला का आयोजन किया जाता है, जिसमें रावण के वध का दृश्य दिखाया जाता है। यह एक नाटकीय प्रस्तुति होती है, जो नैतिक शिक्षा देने का कार्य करती है। 

- **सामाजिक एकता:**  

  दशहरा लोगों को एकत्रित करने का एक अवसर है। इस दिन लोग एक साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं, जिससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं।

### उपसंहार

दशहरा केवल एक त्यौहार नहीं है; यह जीवन के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को समझने और उनसे सीखने का अवसर है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपनी बुराइयों से लड़ें और अच्छाई को अपनाएँ। इस प्रकार, दशहरा न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है।

नवरात्रि का आठवां दिन

 


### नवरात्रि का आठवां दिन: 

**परिचय:**

नवरात्रि, देवी दुर्गा की पूजा का एक प्रमुख त्यौहार है, जो नौ रातों तक चलता है। हर रात देवी के एक अलग रूप की आराधना की जाती है। नवरात्रि का आठवां दिन, जिसे "महागौरी अष्टमी" या "दुर्गा अष्टमी" कहा जाता है, इस पर्व का एक महत्वपूर्ण और पवित्र दिन है। इस दिन देवी दुर्गा के आठवें रूप, महागौरी की पूजा की जाती है।

### महागौरी की पूजा

**महागौरी का स्वरूप:**

महागौरी देवी का स्वरूप अत्यंत सौम्य और दिव्य है। उनका रंग श्वेत है, जो शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है। वे चार भुजाएँ धारण करती हैं, जिनमें से एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू होता है। उनका वाहन बैल है।

### पूजा विधि

1. **स्नान और शुद्धता:**  

   भक्तजन इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और पवित्र वस्त्र पहनते हैं। यह पूजा का पहला चरण होता है।

2. **पूजा सामग्री:**  

   पूजा में निम्नलिखित सामग्री का उपयोग होता है:

   - **फूल:** सफेद और रंग-बिरंगे फूलों का प्रयोग।

   - **फल:** विशेषकर नारियल, सेब और अन्य मीठे फल।

   - **मिठाइयाँ:** खासकर पंजीरी, लड्डू आदि।

   - **दीपक और धूप:** पूजा की रोशनी और सुगंध के लिए।

3. **आरती और भजन:**  

   भक्तजन इस दिन महागौरी की आरती करते हैं और देवी की स्तुति में भजन गाते हैं। इस दिन विशेष रूप से "दुर्गा सप्तशती" का पाठ भी किया जाता है।

### महागौरी अष्टमी का महत्व

1. **शक्ति और साहस का प्रतीक:**  

   महागौरी देवी, शक्ति, साहस और समर्पण का प्रतीक मानी जाती हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से भक्तों में आत्मविश्वास और सकारात्मकता बढ़ती है।

2. **बुराई का अंत:**  

   महागौरी के रूप में देवी की पूजा करने से बुराइयों का अंत होता है और जीवन में सुख-शांति का आगमन होता है। यह दिन नकारात्मकता से मुक्ति पाने का भी अवसर है।

3. **नवीनता और परिवर्तन:**  

   इस दिन भक्तजन नए संकल्प लेते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। यह दिन आत्म-सुधार और नवीनीकरण का भी प्रतीक है।

4. **कन्या पूजन:**  

   नवरात्रि के आठवें दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है, जो देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। भक्तजन उन्हें भोजन कराते हैं और उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं।

### उपसंहार

नवरात्रि का आठवां दिन, महागौरी अष्टमी, शक्ति, साहस और पवित्रता का प्रतीक है। यह दिन भक्तों को अपनी बुराइयों से लड़ने, सकारात्मकता को अपनाने और जीवन में नए संकल्प लेने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन की पूजा से भक्तों को मानसिक शांति, सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। महागौरी की कृपा से जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं और मन में सच्ची श्रद्धा और भक्ति का संचार होता है।

नवरात्री का सातवाँ दिन


 माँ कालरात्रि का स्वरूप और महत्व नवरात्रि के सातवें दिन विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन का ध्यान देवी की शक्ति और उनके अंधकार से निकलने के अद्भुत रूप पर केंद्रित होता है। आइए, हम विस्तार से माँ कालरात्रि के बारे में जानते हैं:

### स्वरूप और प्रतीक:

1. **शारीरिक रूप**: माँ कालरात्रि का रूप भयावह और शक्तिशाली है। उनका शरीर काला है, जो अंधकार का प्रतीक है। उनके तीन आंखें हैं, जो उन्हें चारों ओर की दुनिया का ज्ञान प्रदान करती हैं। वे अक्सर अपने हाथों में तलवार और डंडा लिए हुए दिखाई देती हैं, जो शक्ति और नाश का प्रतीक हैं।

2. **सवारी**: माँ कालरात्रि की सवारी एक गधे पर होती है, जो निर्भीकता और साधारणता का प्रतीक है। गधा साधारणता और आत्मविश्वास का प्रतीक है, जिससे यह दर्शाया जाता है कि सच्ची शक्ति साधारणता में निहित होती है।

### धार्मिक महत्व:

1. **अंधकार से प्रकाश की ओर**: माँ कालरात्रि का नाम ही उनके अंधकार से जुड़ाव को दर्शाता है। वे यह सिखाती हैं कि जीवन में कठिनाइयों और अंधकार के समय में भी विश्वास और साहस बनाए रखना चाहिए। उनका उपासना अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने में मदद करती है।

2. **दुष्ट शक्तियों का नाश**: मान्यता है कि माँ कालरात्रि ने दुष्ट शक्तियों जैसे राक्षसों को नष्ट करने के लिए यह रूप धारण किया। उनका पूजा करने से भक्त दुष्ट विचारों और बुरी शक्तियों से सुरक्षित रहते हैं।

3. **आत्म-विश्वास**: माँ कालरात्रि अपने भक्तों को आत्म-विश्वास और साहस प्रदान करती हैं। वे हर कठिनाई का सामना करने की प्रेरणा देती हैं।

### पूजा विधि:

- **पंचोपचार पूजा**: पूजा में आमतौर पर पंचोपचार विधि का पालन किया जाता है, जिसमें जल, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और फल अर्पित किए जाते हैं।

- **मंत्र जाप**: भक्त "ॐ देवी कालरात्र्यै नमः" का जप करते हैं। इस मंत्र का जप करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है।

- **रात्रि जागरण**: इस दिन भक्तों का जागरण करना और माँ की आरती करना भी विशेष माना जाता है। यह भक्तों को देवी की शक्ति से भरपूर करता है।

### विशेष प्रसाद:

- इस दिन काले तिल, गुड़, और अन्य काले रंग के खाद्य पदार्थों का विशेष महत्व है। ये प्रसाद माँ को अर्पित किए जाते हैं, और भक्तों में वितरित किए जाते हैं।

### उपसंहार:

माँ कालरात्रि की आराधना केवल भक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि यह जीवन में साहस, आत्म-विश्वास, और मानसिक शांति को प्राप्त करने का एक साधन है। उनके आशीर्वाद से भक्त सभी प्रकार की बाधाओं को पार कर सकते हैं और एक सफल जीवन की ओर अग्रसर हो सकते हैं। नवरात्रि के इस पावन अवसर पर माँ कालरात्रि की कृपा से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है।

नवरात्री का छठा दिन

 



 मां कात्यायनी की महत्वता

मां कात्यायनी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से एक हैं और उनका पूजन विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान किया जाता है। उन्हें शक्ति और ज्ञान की देवी माना जाता है। कात्यायनी का नाम ऋषि कात्यायन से लिया गया है, जिन्होंने कठोर तप करके मां को प्रसन्न किया था।

 महत्वता:

1. **शक्ति और साहस**:

 मां कात्यायनी को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है। उनके भक्तों को कठिनाइयों का सामना करने में मदद मिलती है।

2. **सामाजिक और पारिवारिक कल्याण**

: उनकी पूजा से पारिवारिक सुख और सामंजस्य की प्राप्ति होती है।

3. **दुश्मनों का नाश**: 

मां कात्यायनी असुरों और दुश्मनों का नाश करने में सक्षम मानी जाती हैं।

 पूजा कैसे करें

1. **सामग्री एकत्रित करें**: 

   - लाल रंग का वस्त्र

   - दूध, दही, घी, चीनी, फल, फूल (विशेषकर लाल रंग के फूल)

   - अगरबत्ती और दीपक

2. **स्थान तय करें**: 

   पूजा के लिए एक स्वच्छ और शांत स्थान चुनें। वहां मां का चित्र या मूर्ति स्थापित करें।

3. **स्नान और शुद्धता**: 

   पूजा करने से पहले स्नान करें और शुद्धता का ध्यान रखें।

4. **पूजा विधि**: 

   - पहले दीपक जलाएं और अगरबत्ती लगाएं।

   - मां का ध्यान करते हुए उन्हें लाल वस्त्र पहनाएं।

   - उन्हें फल, मिठाई और अन्य भोग अर्पित करें।

   - मां के सामने घी का दीपक जलाएं।

5. **आरती**: 

   पूजा के बाद मां कात्यायनी की आरती करें। 

 मंत्र

मां कात्यायनी का प्रमुख मंत्र है:

**"ॐ कात्यायनी महादेवी सर्वज्ञे सर्वदुष्टनाशिनि।  

त्वं मे सर्वसम्पत् दत्तुं भवानी हरिविघ्नं शमयि।"**

इस मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति और शक्ति की प्राप्ति होती है।

निष्कर्ष

मां कात्यायनी की पूजा श्रद्धा और भक्ति से करनी चाहिए। उनकी कृपा से सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि का संचार होता है। नवरात्रि के अवसर पर विशेष रूप से उनकी उपासना करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

नवरात्रि का पांचवां दिन


 चैत्र नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता को समर्पित होता है, जो देवी दुर्गा का एक महत्वपूर्ण रूप हैं। इस दिन की पूजा का विशेष महत्व है और यह भक्तों के लिए शक्ति, मातृत्व और समर्पण का प्रतीक है। आइए इसके महत्व को विस्तार से समझते हैं:

स्कंदमाता का स्वरूप

  • रूप और अवतार: स्कंदमाता का स्वरूप बेहद दिव्य और करुणामय होता है। वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं और उनके हाथ में भगवान कार्तिकेय (स्कंद) होते हैं। उनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और गरिमा का प्रतीक है।
  • चन्द्रमा और कमल: उनके माथे पर चन्द्रमा और हाथ में कमल पुष्प होता है, जो सौम्यता और पवित्रता का प्रतीक है।

महत्व

  1. मातृत्व का प्रतीक:

    • स्कंदमाता मातृत्व का पूर्ण रूप हैं। वे अपने भक्तों के लिए संरक्षण, प्यार और स्नेह प्रदान करती हैं। उनके प्रति भक्ति से भक्तों को मातृस्वरूप का अनुभव होता है।
  2. शक्ति और साहस:

    • स्कंदमाता का नाम सुनते ही भक्तों में साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है। उन्हें संकटों से पार पाने की शक्ति प्राप्त होती है।
  3. सिद्धियों की प्राप्ति:

    • स्कंदमाता की पूजा से भक्तों को विभिन्न सिद्धियों की प्राप्ति होती है। यह दिन ज्ञान, विद्या और समृद्धि के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
  4. धन और समृद्धि:

    • देवी की आराधना से आर्थिक स्थिति में सुधार और समृद्धि की प्राप्ति होती है। उनके आशीर्वाद से धन, सुख और संपत्ति की कमी नहीं होती।
  5. मनोकामनाओं की पूर्ति:

    • स्कंदमाता की कृपा से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। खासकर माता-पिता अपने बच्चों की भलाई और सफलता के लिए इस दिन विशेष प्रार्थना करते हैं।

पूजा विधि

  1. सफेद रंग के फूल: इस दिन सफेद रंग के फूलों का प्रयोग करें, क्योंकि यह देवी का प्रिय रंग है।
  2. फल और मिठाई: भक्त फल, खासकर केले और मिठाई अर्पित करते हैं।
  3. मंत्र जप: "ॐ देवी स्कंदमाता नमः" का जाप करें। यह मंत्र देवी की कृपा प्राप्त करने में सहायक होता है।
  4. दीप जलाना: पूजा स्थल पर दीप जलाना और देवी की आरती करना भी महत्वपूर्ण है।
  5. स्वच्छता: पूजा से पहले स्वच्छता का ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि यह पूजा का एक महत्वपूर्ण भाग है।

निष्कर्ष

स्कंदमाता की पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह शक्ति, प्रेम और संरक्षण का एक गहरा अनुभव है। भक्तों को इस दिन अपने कार्यों में सफलता, सुख और शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इस दिन की आराधना से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं।

नवरात्री चौथा दिन


 माँ कुष्मांडा देवी दुर्गा के चारों रूपों में से एक हैं और उन्हें नवरात्रि के चौथे दिन पूजा जाता है। उनकी पूजा का विशेष महत्व है, जो उनके स्वरूप, विशेषताओं, और भक्तों के जीवन में उनके प्रभाव से जुड़ा हुआ है। यहाँ माँ कुष्मांडा का महत्व विस्तार से समझाया गया है:

1. स्वरूप और प्रतीक:

  • माँ कुष्मांडा का स्वरूप बहुत ही सुंदर और आकर्षक होता है। वे चार भुजाएँ धारण करती हैं, जिसमें से एक हाथ में कमंडल, दूसरे में धनुष, तीसरे में बाण, और चौथे में फल या पुष्प होता है।
  • उनके चेहरे पर एक मुस्कान होती है, जो उनके सौम्य स्वभाव को दर्शाती है। उनके माथे पर चाँद का चिह्न होता है, जो शांति और समृद्धि का प्रतीक है।

2. सृष्टि की देवी:

  • माँ कुष्मांडा को सृष्टि की देवी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने ब्रह्मांड की रचना की थी। उनके नाम का अर्थ है "कुश" (फल) और "अंडा" (सृष्टि)। यह दर्शाता है कि वे जीवन का स्रोत हैं।

3. शक्ति और ऊर्जा:

  • माँ कुष्मांडा अपने भक्तों को शक्ति और ऊर्जा प्रदान करती हैं। उनकी उपासना से व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मविश्वास, और साहस की वृद्धि होती है। वे कठिनाइयों का सामना करने के लिए बल प्रदान करती हैं।

4. आध्यात्मिक उन्नति:

  • माँ कुष्मांडा की पूजा से भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होता है। वे ध्यान और साधना के माध्यम से आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती हैं।

5. कष्टों का निवारण:

  • माँ कुष्मांडा अपने भक्तों के दुखों और कष्टों को दूर करती हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति जीवन में आने वाली समस्याओं से मुक्ति पा सकता है।

6. बुद्धि और ज्ञान की देवी:

  • माँ कुष्मांडा ज्ञान और बुद्धि की देवी भी मानी जाती हैं। उनकी उपासना से व्यक्ति के विचारों में स्पष्टता और निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है।

7. मंत्र और जप:

  • माँ कुष्मांडा का एक प्रमुख मंत्र है.
    ओम देवी कुष्मांडा यै नमः।
  • इस मंत्र का जप करने से भक्तों को मानसिक शांति, शक्ति, और दिशा मिलती है।

8. समाज में सकारात्मकता:

  • माँ कुष्मांडा की उपासना से समाज में सकारात्मकता और सद्भावना फैलती है। उनकी पूजा सामूहिकता और एकता को बढ़ावा देती है, जो विशेष रूप से नवरात्रि जैसे पर्वों में देखी जाती है।

9. पारिवारिक समृद्धि:

  • माँ कुष्मांडा की उपासना से पारिवारिक जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। वे अपने भक्तों को अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

निष्कर्ष:

माँ कुष्मांडा का महत्व न केवल धार्मिक बल्कि जीवन के हर पहलू में है। उनकी उपासना से व्यक्ति में आत्मबल, साहस, और ज्ञान की वृद्धि होती है। माँ कुष्मांडा की भक्ति और साधना से भक्त अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं और सृष्टि के रहस्यों को समझने की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

नवरात्री का तीसरा दिन


 चंद्र घंटा माता हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण देवी मानी जाती हैं और इन्हें नवरात्रि के तीसरे दिन पूजा जाता है। चंद्र घंटा माता का विशेष महत्व है, जो उनके स्वरूप, विशेषताओं और उपासना के माध्यम से समझा जा सकता है। 

1. स्वरूप और प्रतीक:

चंद्र घंटा माता का स्वरूप बहुत ही अद्भुत और शक्तिशाली होता है। वे एक हाथ में घंटा और दूसरे हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं। उनके माथे पर चाँद का चिह्न होता है, जो शांति और शीतलता का प्रतीक है। उनका यह स्वरूप युद्ध और विजय का प्रतीक भी है।

2. शक्ति और सुरक्षा:

चंद्र घंटा माता को सुरक्षा और शक्ति की देवी माना जाता है। वे अपने भक्तों को नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करती हैं और मानसिक शक्ति प्रदान करती हैं। उनका मंत्र जप करने से भक्तों को आत्मबल मिलता है और वे कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं।

3. साधना और भक्ति:

चंद्र घंटा माता की पूजा में साधना और भक्ति का विशेष महत्व है। भक्तगण उनका ध्यान करने के लिए उपवास रखते हैं और श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करते हैं। यह उनकी शक्ति को जागृत करने का एक साधन है।

4. तपस्या और संयम:

चंद्र घंटा माता की उपासना से व्यक्ति में तप और संयम की भावना जागृत होती है। यह उन्हें कठिनाईयों को सहन करने और अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए दृढ़ रहने की प्रेरणा देती है।

5. आध्यात्मिक उन्नति:

चंद्र घंटा माता की पूजा से भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होता है। उनकी उपासना से ध्यान और समर्पण की भावना बढ़ती है, जो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।

6. समाज में सकारात्मकता:

चंद्र घंटा माता की उपासना समाज में सकारात्मकता फैलाने में मदद करती है। उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति से भक्तों के बीच एकता और सामंजस्य बढ़ता है। नवरात्रि के समय में, सामूहिक पूजा और उत्सवों का आयोजन होता है, जिससे सामूहिकता का अनुभव होता है।

7. मंत्र और जप:

चंद्र घंटा माता का एक प्रमुख मंत्र है:

ओम चंद्रघंटायै नमः।

इस मंत्र का जप करने से भक्तों को मानसिक शक्ति, धैर्य, और साहस मिलता है। यह मंत्र ध्यान केंद्रित करने और देवी की कृपा प्राप्त करने में मदद करता है।

8. संघर्ष और विजय:

चंद्र घंटा माता का ध्यान करने से भक्तों को संघर्षों का सामना करने की शक्ति मिलती है। वे विजय का प्रतीक हैं, जो भक्तों को असफलताओं से उबरने और सफलता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।

9. पारिवारिक और सामाजिक जीवन में समृद्धि:

चंद्र घंटा माता की उपासना से पारिवारिक जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। उनकी कृपा से घर में सकारात्मकता बनी रहती है और सदस्यों के बीच समझदारी और प्रेम बढ़ता है।

निष्कर्ष:

चंद्र घंटा माता की पूजा से व्यक्ति को शक्ति, साहस, और सुरक्षा की प्राप्ति होती है। उनकी उपासना के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। चंद्र घंटा माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा करना आवश्यक है, जिससे भक्त अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफल हो सके।

नवरात्री का दूसरा दिन


 माँ ब्रह्मचारिणी हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण देवी मानी जाती हैं। ये देवी दुर्गा के दूसरे रूप हैं और इन्हें नवरात्रि के दूसरे दिन की पूजा की जाती है।

इतिहास और पौराणिक कथा:

माँ ब्रह्मचारिणी का संबंध देवी दुर्गा के अवतारों से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पहले ये सती के रूप में प्रकट हुई थीं और भगवान शिव के प्रति अपनी अटूट भक्ति के लिए जानी जाती थीं। सती के बाद, जब उन्होंने पार्वती का रूप धारण किया, तो उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। उनकी तपस्या इतनी कठिन थी कि भगवान शिव ने उन्हें देखकर उनके तप को मान्यता दी और उन्हें देवी का रूप प्रदान किया।

 स्वरूप और प्रतीक:

माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप बहुत ही आकर्षक और शांति देने वाला होता है। उनका शरीर पीले रंग का होता है, जो समृद्धि और आनंद का प्रतीक है। वे अपने हाथों में जप माला और जल का कलश रखती हैं, जो साधना और ज्ञान का प्रतीक है। उनका ध्यान साधना और भक्ति पर केंद्रित है।

भावनात्मक शक्ति:

माँ ब्रह्मचारिणी को ध्यान और समर्पण की देवी माना जाता है। उनके प्रति भक्ति रखने वाले भक्तों को मानसिक स्थिरता और शांति का अनुभव होता है। वे जीवन की चुनौतियों को सामना करने में साहस देती हैं। उनकी उपासना से भक्तों में आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है।

तपस्या का महत्व:

माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा का एक प्रमुख पहलू तपस्या है। यह दर्शाता है कि बिना कठिनाई और प्रयास के कुछ भी प्राप्त नहीं होता। तपस्या के माध्यम से व्यक्ति आत्म-ज्ञान और अद्वितीय अनुभव प्राप्त कर सकता है। यह भी सिखाता है कि लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पण और धैर्य आवश्यक हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:

माँ ब्रह्मचारिणी का अनुसरण समाज में सकारात्मकता फैलाने का कार्य करता है। उनकी उपासना के दौरान, लोग मिलकर पूजा करते हैं, जिससे सामूहिकता और एकता की भावना बढ़ती है। यह नवरात्रि जैसे पर्वों पर विशेष रूप से देखी जाती है, जहाँ महिलाएं अपने परिवार के साथ मिलकर पूजा करती हैं।

मंत्र और जप:

माँ ब्रह्मचारिणी का एक प्रमुख मंत्र है

ओम देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः।

इस मंत्र का जप करने से मन की शांति और ध्यान में एकाग्रता प्राप्त होती है। साधकों को सलाह दी जाती है कि वे इस मंत्र का जप करते समय ध्यान केंद्रित करें और अपनी इच्छाओं का संकल्प लें।

अध्यात्मिक दृष्टिकोण:

माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना से व्यक्ति आत्म-शोध और आत्म-उन्नति की दिशा में आगे बढ़ता है। यह उन्हें अपने आंतरिक स्वरूप को पहचानने और अपनी कमजोरियों पर विजय पाने में मदद करती है। उनकी कृपा से साधक अपने जीवन के लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

माँ ब्रह्मचारिणी का महत्व केवल धार्मिक परिप्रेक्ष्य में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में है। उनकी प्रेरणा से साधक अपने जीवन को संवारने, कठिनाइयों का सामना करने और आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ने की प्रेरणा लेते हैं। उनकी भक्ति और उपासना से जीवन में स्थिरता, संतोष और खुशी प्राप्त होती है।


नवरात्री का पहला दिन

 

नवरात्रि का पर्व हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा के लिए मनाया जाता है और यह नवरात्रि का त्योहार चाँद के अनुसार, अश्विन मास में आता है। यह पर्व माँ दुर्गा की आराधना का समय है, जो भक्तों को शक्ति, साहस और संजीवनी प्रदान करती हैं।

पहले नवरात्र की महत्ता:

पहले नवरात्र को "शैलपुत्री" देवी की पूजा की जाती है। शैलपुत्री देवी, दुर्गा जी के पहले रूप में जानी जाती हैं और यह देवी शक्ति, समर्पण और भक्ति का प्रतीक हैं। उन्हें पर्वतों की पुत्री माना जाता है और यह शक्ति के अवतार के रूप में पूजा जाती हैं।

पूजा की विधि:
सामग्री एकत्रित करें:

नीम की पत्तियाँ, फूल, फल, दीपक, धूप, और अनाज (जैसे चावल, गेहूँ)।
माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र।
संध्या समय पर पूजा:

स्वच्छ स्थान पर पूजा की व्यवस्था करें।
पहले हाथ-पैर धोकर शुद्धता का ध्यान रखें।
दीप जलाना:

एक मिट्टी के दीपक में घी या तेल डालकर उसमें बत्ती लगाकर जलाएं।
माँ का आवाहन:

देवी का ध्यान करते हुए उन्हें आमंत्रित करें और उनका ध्यान केंद्रित करें।
नैवेद्य अर्पण:

फल, मिठाई और अन्य भोग अर्पित करें।
आरती और मंत्र:

देवी की आरती करें और "जय माता दी" का जाप करें। आप शैलपुत्री देवी के मंत्र का भी जाप कर सकते हैं:
"ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।"
प्रसाद वितरण:

पूजा के बाद प्रसाद सभी को वितरित करें।

हिन्दू धर्म में इतने देवता क्यों हैं?


 प्रचलित गलत धारणाओं के विपरीत, हिंदू सभी अलग – अलग नामों से एक सर्वोच्च ईश्वर की पूजा करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अलग – अलग भाषाओं और संस्कृतियों वाले भारत के लोगों ने अपने अलग – अलग तरीके से एक ईश्वर को समझा है। इतिहास में चार प्रमुख हिंदू संप्रदायों रहे हैं – शैव, शाक्त, वैष्ण और स्मार्त। शैव लोगों के लिए, ईश्वर शिव है। शाक्त लोगों के लिए, देवी शक्ति सर्वोपरि है। वैष्णवों के लिए, भगवान विष्णु ईश्वर हैं। स्मार्त लोगों के लिए – जो सभी देवताओं को एक ही ईश्वर का प्रतिबिम्ब मानते हैं-ईश्वर का चुनाव भक्त पर छोड़ दिया गया है। यह उदार स्मार्त परिप्रेक्ष्य सर्वविदित है, लेकिन यह प्रचलित हिंदू दृष्टिकोण नहीं है। इस विविधता के कारण, हिंदू अन्य धर्मों के प्रति गहन सहिष्णुता रखता है, इस तथ्य का सम्मान करता है कि प्रत्येक का एक ईश्वर की तरफ़ अपना मार्ग है।

हिंदू धर्म में एक अद्भुत समझ यह है कि ईश्वर दूर नहीं है, जो किसी दूरस्थ स्वर्ग में रहता हो, बल्कि वह प्रत्येक आत्मा के भीतर निवास करता है, हृदय और चेतना में, अपने तलाश किये जाने की प्रतीक्षा करता है। यह जानना कि ईश्वर हमेशा हमारे साथ है, हमें आशा और साहस देता है। इस अंतरंग और अनुभवात्मक तरीके से एक महान ईश्वर को जानना हिंदू आध्यात्मिकता का लक्ष्य है।

व्याख्या: हिंदू धर्म एकेश्वरवादी और एकाधिदेववादी, दोनों है। हिंदू कभी बहुदेववादी नहीं था, इस अर्थ में कि कई देवता हैं, जो एकसमान हैं। एकधिदेववाद (शाब्दिक “एक ईश्वर”) हिंदू दृष्टिकोण को बेहतर ढंग से परिभाषित करता है। इसका अर्थ है दूसरे देवताओं के अस्तित्व को नकारे बिना एक ईश्वर की आराधना करना। हम हिंदू उस सर्वव्यापी ईश्वर में विश्वास करते हैं जो पूरे ब्रह्मांड को ऊर्जावान करता है। हम उसे मनुष्य और सभी प्राणियों की आँखों से बाहर चमकते हुए जीवन में देख सकते हैं। ईश्वर का सभी देवताओं में निवास करने और उन्हें जीवन देने का यह दृष्टिकोण सर्वदेववाद कहलता है। यह सर्वेश्वरवाद से अलग है, जो यह मान्यता है कि ईश्वर केवल प्राकृतिक ब्रह्माण्ड है और कुछ नहीं। यह कठोर ईश्वरवाद से भी अलग है जो कहता है कि भगवान केवल दुनिया के ऊपर, इसके परे और पारलौकिक है। सर्वेश्वरवाद एक सर्वव्यापी अवधारणा है। यह कहता है कि परमेश्वर दुनिया में और उससे परे है, वह चिरस्थायी और पारलौकिक दोनों है। यह उच्चतम हिंदू दृष्टिकोण है। हिंदू भी कई देवताओं पर विश्वास करते हैं जो एक बड़े निगम में अधिकारियों की तरह विभिन्न कार्य करते हैं। इनको लेकर परम परमेश्वर के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए। ये देवता अत्यधिक उन्नत प्राणी हैं जिनके विशिष्ट कर्तव्य और शक्तियां हैं – जो स्वर्ग में रहने वाली आत्माओं, अधिपतियों या दूसरे धर्मों के सम्मानित देवदूतों से अलग नहीं हैं। प्रत्येक संप्रदाय परमात्मा और उसके अपने दिव्य प्राणियों के समूह की पूजा करता है। कभी – कभी गैर – हिंदुओं को भ्रमित करने वाली बात यह है कि विभिन्न संप्रदायों के हिंदू अपने संप्रदाय या क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार एक ईश्वर को कई अलग – अलग नामों से बुला सकते हैं। हिंदू के लिए सत्य के कई नाम हैं, लेकिन यह कई सत्य की बात नहीं करता। हिंदू धर्म हमें अपने तरीके से भगवान से संपर्क करने की स्वतंत्रता देता है, पथ की बहुलता को प्रोत्साहित करता है, केवल एक के अनुपालन की बात नहीं करता।

हिन्दुओं में भी इस विषय को लेकर बहुत भ्रम है। सही शब्द और उनमें सूक्ष्म अंतर जानें, और आप हिंदुओं को देवत्व को देखने के गहन तरीके की व्याख्या कर सकते हैं। अन्य लोग भगवान की भारतीय अवधारणाओं की समृद्धि से प्रसन्न होंगे। आप यह उल्लेख करना चाह सकते हैं कि कुछ हिंदू केवल निराकार पूर्णवास्तविक के रूप में ईश्वर में विश्वास करते हैं; दूसरे ईश्वर को व्यक्तिगत भगवान और निर्माता के रूप में मानते हैं। यह स्वतन्त्रता हिन्दू धर्म में ईश्वर की समझ को, जो सबसे पुराना जीवित धर्म है, धरती पर मौजूद सबसे समृद्ध धर्म बनाती है।

कैसे करें श्री गणेश प्रतिमा को विसर्जित

 


Anant Chaturdashi 2024: 7 सितंबर 2024 से गणेशोत्सव की शुरूआत हो चुकी है, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी पर होगा।

 पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस साल अनंत चतुर्दशी 17 सितंबर 2024 को है।

 इस दिन गणपति बप्पा की मूर्ति को विसर्जित किया जाता है। इस दौरान भक्तजन बप्पा से अगले साल फिर से आने की कामना करते हुए, विधि विधान से पूजा करते हैं। 

हिंदू धर्म में गणेश भगवान को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी नए कार्य की शुरुआत से पहले उनकी पूजा का विधान है।

 उनकी आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। ऐसे में अनंत चतुर्दशी पर बप्पा की अर्चना से हर मनोकामना पूरी होती हैं।

 धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बप्पा को विदाई देने से पहले पूरे परिवार के साथ उन्हें मोदक का भोग लगाना चाहिए। 

वहीं जिस धूमधाम से गणपति जी को लाया जाता है, ठीक वैसे ही नियमों के अनुसार उन्हें विदाई भी दी जाती हैं। 

इस दौरान कुछ खास बातों का ध्यान रखा जाता है, जिससे विसर्जन विधि के सफल होने की संभावना बढ़ जाती हैं। आइए इसके बारे में जानते हैं।

गणेश विसर्जन शुभ मुहूर्त

17 सितंबर 2024 को गणपति विसर्जन के लिए मुहूर्त सुबह 09:10 से दोपहर 01:46 तक रहेगा।

 इस दौरान अपराह्न मुहूर्त दोपहर 03:18 से शाम 04:50 बजे तक है। इसके अलावा सायाह्न मुहूर्त रात 07:51 बजे से रात 09:19 बजे तक रहने वाला है।

 आप इन मुहूर्त के अनुसार गणेश विसर्जन कर सकते हैं।

गणेश विसर्जन के दौरान ध्यान रखें ये बातें

गणेश विसर्जन के दिन सबसे पहले पूरे परिवार के साथ गणपति बप्पा की पूजा करनी चाहिए। 

इस दिन गणेश जी को मोदक के भोग के साथ-साथ 56 भोग भी अर्पित करें। 

अगर आप विसर्जन करने जा रहें हैं, तो भूलकर भी काले या नीले रंग के कपड़े न पहनें। इसे अशुभ माना जाता है।

इस दौरान गणेश जी की कृपा पाने के लिए दुर्वा की 21 गांठे चाढ़ानी चाहिए।

गणेश विसर्जन के दिन जब भी आप बप्पा की मूर्ति को घर से लेकर जाते हैं, तो पहले उसे पूरे घर में ले जाएं।

ध्यान रखने कि जब भी आप बप्पा को घर से विदा करते हैं, तो उनका मुख घर की तरफ रखें और पीठ बाहर की तरफ।

गणपति जी को विसर्जन स्थान पर ले जाने के बाद एक बार फिर से कपूर से आरती करनी चाहिए।

इस दौरान गणेश पूजन में उपयोग हुई सामग्रियों को भी विसर्जित कर देना चाहिए।

गणेश जी की मूर्ति को पानी में धीरे-धीरे विसर्जित करें। इसे एकदम से पानी में नहीं छोड़ना चाहिए।

विसर्जन के वक्त श्री गणेश के मंत्रों का जाप जरूर करना चाहिए।

10 दिन श्री गणेश प्रतिमा हमारे घर में विराजित रही और अब उनकी विदाई होगी।

 इन 10 दिन तक उन्हें प्रसन्न करने के हर प्रकार के जतन किए जाते हैं। उन्हें हर प्रकार का भोग लगाया जाता है। 

उनकी पूजन-अर्चन की जाती है। कहीं-कहीं पर श्री गणेश को डेढ़ दिन, 3 दिन, 5 दिन और 7 दिन रखते हैं।

 अब बारी आ रही है इस बात की कि उन्हें कैसी बिदाई दी जाए।

 परंपरानुसार कहा जाता है कि श्री गणेश प्रतिमा को उसी तरह बिदा किया जाना चाहिए

 जैसे हमारे घर का सबसे प्रिय व्यक्ति जब यात्रा पर निकले तब हम उनके साथ व्यवहार करते हैं।"

"कैसे करें श्री गणेश प्रतिमा को विसर्जित, 10 काम की बातें"



सबसे पहले 10 दिन या डेढ़ दिन, 3 दिन, 5 दिन और 7 दिन तक की जाने वाली आरती-पूजन-अर्चन करें। विशेष प्रसाद का भोग लगाएं

अब श्री गणेश का स्वस्तिवाचन करें।

एक स्वच्छ पाटा लें। उसे गंगाजल या गौमूत्र से पवित्र करें। घर की स्त्री उस पर स्वास्तिक बनाएं। उस पर अक्षत रखें। इस पर एक पीला, गुलाबी या लाल सुसज्जित वस्त्र बिछाएं।

इस पर गुलाब की पंखुरियां बिखेरें। साथ में पाटे के चारों कोनों पर चार सुपारी रखें।

अब श्री गणेश को उनके जयघोष के साथ स्थापना वाले स्थान से उठाएं और इस पाटे पर विराजित करें। 

पाटे पर विराजित करने के उपरांत उनके साथ फल, फूल, वस्त्र, दक्षिणा, 5 मोदक रखें।

 * एक छोटी लकड़ी लें। उस पर चावल, गेहूं और पंच मेवा की पोटली बनाकर बांधें। यथाशक्ति दक्षिणा सिक्के) रखें।

 मान्यता है कि मार्ग में उन्हें किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।

 इसलिए जैसे पुराने समय में घर से निकलते समय जो भी यात्रा के लिए तैयारी की जाती थी वैसी श्री गणेश के बिदा के समय की जानी चाहिए।

नदी, तालाब या पोखर के किनारे विसर्जन से पूर्व कपूर की आरती पुन: संपन्न करें। 

श्री गणेश से खुशी-खुशी बिदाई की कामना करें और उनसे धन, सुख, शांति, समृद्धि के साथ मनचाहे आशीर्वाद मांगे।

 10 दिन जाने-अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थना भी करें।

श्री गणेश प्रतिमा को फेंकें नहीं उन्हें पूरे आदर और सम्मान के साथ वस्त्र और समस्त सामग्री के साथ धीरे-धीरे बहाएं।

श्री गणेश प्रतिमा इको फ्रेंडली हैं तो पुण्य अधिक मिलेगा क्योंकि वे पूरी तरह से पानी में गलकर विलीन हो जाएंगे। आधे अधूरे और टूट-फूट के साथ रूकेंंगे नहीं। 

 * श्री गणेश प्रतिमा इको फ्रेंडली हैं तो उन्हें घर में विसर्जित कर अपने गमले में यह पानी डाल कर हमेशा अपने पास रख सकते हैं। 

हनुमान चालीसा अर्थ सहित





श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जस जो दायक फल चारि ।

गुरु के चरणों पर लगे हुए रज से अपने मन को पवित्र कर के 
मैं चारों फलों को देने वाले श्रीराम जी के निर्मल यश का वर्णन करता हूं ।

बुद्धि हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार ।

मैं बुद्धि से हीन हूं । मैं आप - हनुमान जी का स्मरण करता हूं । 
आप मुझे बल दें , बुद्धि दें और विद्या दें । 
आप मेरी समस्याओं का निवारण करें ।

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ।
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर ॥१।

आप में अपार ज्ञान हैं । आप में अपार गुण हैं । 
आप वानरों में श्रेष्ठ हैं । आप तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं । 
आपकी जय हो ।

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

आप श्रीराम जी के दूत हैं । आप का बल अतुल्य हैं । 
आप के दो प्रसिद्ध नाम है– अंजनीपुत्र और पवनसुत ।

महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥३॥

आप महावीर हैं । आप पराक्रमी हैं । 
आप का शरीर वज्र के समान है । 
आप दुष्टों का विनाश करने वाले हैं । 
आप सज्जनों का साथ देने वाले हैं ।

कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुंचित केसा ॥४॥

आप का शरीर का रंग सोने के समान है । 
आप का वेष सुंदर है । आप के कान में चमकते हुए कुण्डल हैं ।
 आप के बाल घुंघराले हैं ।

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेऊ छाजै ॥५॥

आप के हाथ में श्रीराम जी का ध्वज है ।
 आप के कंधे पर यज्ञोपवीत है।

शंकर स्वयं केसरीनंदन ।
तेज प्रताप महा जग बंदन ॥६॥

आप साक्षात् भगवान शंकर हैं । आप केसरी के पुत्र हैं ।
 आप का अत्यधिक तेज है । आप संपूर्ण जगत से वंदित हैं ।

बिद्यावान गुणी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

आप समस्त विद्योओं को जानते हैं । समस्त गुण आप में हैं ।
 आप चतुर हैं । आप श्रीराम जी के कार्य को करने में उत्सुक रहते हैं ।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

आप को श्रीराम जी का चरित्र प्रिय हैं । 
आप श्रीराम जी, लक्ष्मण जी और सीता मां के मन में बसते हैं ।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥९॥

आप ने अपने सूक्ष्म रूप को धारण करते हुए
 माता सीता के रहते हुए जगह को दिखाया ।
 आप ने अपना भयंकर रूप धारण कर के लंका को जलाया ।

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सँवारे ॥१०॥

आप ने भीम रूप को धारण कर के असुरों का संहार किया । 
आप ने श्रीरामचंद्र का कार्य किया ।

लाय सँजीवनि लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

आप ने मृतसंजीवनी लाकर लक्ष्मण को बचाया ।
 श्रीराम जी की खुशी को ही आप अपनी खुशी मानते हैं ।

रघुपति कीन्ही बहुत बडाई ।
तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई ॥१२।

राम जी आप की बहुत प्रशंसा करते हैं ।
 वे कहते हैं कि तुम मेरे भाई भरत के समान हो ।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥१३॥

सहस्र मुख वाले शेष जी आप के यश को गाते हैं-
 ऐसे कहते हुए श्रीराम जी आप को बार बार गले से लगाते हैं ।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा ।
नारद सारद सहित अहीशा ॥१४॥

सनकादि मुनि, ब्रह्मादि देवगण, नारद, और सरस्वती भी
 आप की प्रशंसा करते हैं ।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते ॥१५॥

यम, कुबेर जैसे दिकपाल भी आप के अनंत यश को गाते हैं
 तो कवि और विद्वान क्या कह सकते हैं इस से अधिक?

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा ।
राम मिलाय राज-पद दीन्हा ॥१६॥

आप ने राम जी का दर्शन कराया सुग्रीव को । 
और उन को किष्किन्धा का साम्राज्य भी दिलवाया ।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना ।
लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

राम भक्ति में आपका अनुसरण करके विभीषण 
लंका के राजा बन गए । यह सब लोग जानते हैं ।

जुग सहस्र जोजन पर भानू ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

आप ने भूमि से हजारों योजन दूर रहते हुए सूर्य को
 एक मधुर फल की तरह निगलने लगा था ।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

राम जी के नाम वाली मुद्रा को लेकर आप ने पूरा समुद्र लांघ दिया था ।

दुर्गम काज जगत के जे ते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे ते ते ॥२०॥

संसार में जितने भी मुश्किल काम हैं 
वे आप के अनुग्रह से आसान बन जाते हैं ।

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

आप राम जी के राजद्वार के रक्षक हैं । 
आप की आज्ञा के बिना कोई भी श्रीराम जी के
 धाम में प्रवेश नहीं कर सकता ।

सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना ।
तुम रक्षक काहू को डर ना ॥२२॥

आप के शरण में आकर लोग साधक बन जाते हैं ।
 आप के शरण में आने से ही सभी सुखों को पाते हैं ।
 आप रक्षा कर रहें हैं तो डर किस बात का है ?

आपन तेज सम्हारो आपे ।
तीनौं लोक हाँक ते काँपे ॥२३॥

आप के तेज से तीनों लोक कांप उठते हैं ।

भूत पिशाच निकट नहीं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

आप के नाम को सुन कर ही भूत प्रेत पिशाच भक्तों के निकट नहीं आते ।

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥२५॥

भक्त आप के नाम को जपते हैं । आप उनके रोग और कष्ट को दूर कर देते हैं ।

संकट तें हनुमान छुडावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावैं ॥२६॥

मन कर्म या वचन से हनुमान जी का ध्यान कीजिए ।
 वे आप को सभी कष्टों से मुक्त करेंगे ।

सब पर राम राय सिरताजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

श्रीराम जी राजाओं में श्रेष्ठ हैं । उनके सभी कार्यों को आपने ही संपन्न किया है ।

और मनोरथ जो कोइ लावै ।
तासु अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

भक्त आप के पास कई मनोरथ लेकर आते हैं । 
आप उन को पूरी कर देते हैं ।

चारिउ जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

आप का तेज चारों युगों में प्रसिद्ध है । वह संपूर्ण जगत में छाया हुआ है ।

साधु संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ॥३०॥

आप ने ही राक्षसों का विनाश किया है । आप ही साधु संतों के रक्षक हैं ।

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता ।
अस बर दीन्ह जानकी माता ॥३१॥

आप आठ सिद्धियों को देने वाले हैं । आप नौ निधियों को देने वाले हैं । 
सीता माता ने आप को यह वरदान दिया है ।

राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सादर हौ रघुपति के दासा ॥३२॥

श्रीराम जी के प्रति प्रेम आप में बहुत है । 
और आप हमेशा उन के प्रति दास्य भाव में रहते हैं ।

तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

आप के भजन को करने से लोग श्रीराम जी को पाते हैं । 
और उन को पाकर जन्मों के दुःखों को भूल जाते हैं ।

अंत काल रघुबर पुर जाई ।
जहां जन्म हरि भगत कहाई ॥३४॥

जिस ने आप का भजन किया है वह बहुत जन्मों तक
 श्रीराम जी का भक्त कहलाया जाता है । 
और वह देहांत के बाद राम जी के दिव्य लोक को पा लेता है ।

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

जो अन्य देवताओं को मन में न रखते हुए भी
 हनुमान जी की सेवा करता है वो सभी सुखों को पा लेता है ।

संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

हनुमान जी को स्मरण करने वालों के सभी संकट दूर हो जाते हैं ।
 सभी कष्ट मिट जाते हैं ।

जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

हनुमान जी! आप की जय हो । 
आप गुरु के समान वात्सल्य से मुझ पर कृपा कीजिए ।

जो शत बार पाठ कर कोई ।
छूटहिं बंदि महा सुख होई ॥३८॥

जो हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा 
वो सभी बंधनों से छूट जाएगा । वो महासुख को पाएगा ।

जो यह पढैं हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

जो प्रतिदिन इस हनुमान चालीसा को पढेगा 
वो सिद्धि को पाएगा । इस के साक्षी भगवान शिव हैं ।

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥

आप निरंतर श्रीराम जी की सेवा करते हैं । 
आप मेरे (तुलसीदास के) हृदय में निवास कीजिए ।

पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥

आप समस्त संकटों को हरने वाले हैं । आप मंगल रूपी हैं ।
 आप श्रीराम,लक्ष्मण और सीता के साथ मेरे हृदय में निवास करें ।

राधा अष्टमी

                                                          




धार्मिक महत्व- राधा अष्टमी के दिन राधा-श्री कृष्ण दोनों की पूजा की जाती है। जो व्यक्ति राधा जी को प्रसन्न कर लेता है, उसे भगवान श्री कृष्ण भी मिल जाते हैं, ऐसी मान्यता है। राधा अष्टमी पर व्रत रखने से जीवन की सभी परेशानियां समाप्त होती हैं। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं।   

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को हुआ, राधा जी भी अष्टमी तिथि को उत्पन्न हुई और रुक्मिणी का जन्म भी अष्टमी तिथि को हुआ है। इसलिए हिंदू धर्म में अष्टमी तिथि को बहुत ही शुभ माना गया है। यह व्रत अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद और परिवार में सुख-समृद्धि और शांति देता है। यह व्रत संतान सुख दिलाने वाला भी माना गया है।  

पौराणिक शास्त्रों में राधा रानी को श्री कृष्ण की बाल सहचरी, भगवती शक्ति माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में राधा जी को लक्ष्मी जी का अवतार भी माना गया है। इसीलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन भी किया जाता है। राधा रानी श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं। राधा अष्टमी का दिन बेहद विशेष और लाभकारी माना गया है। इसीलिए आज के दिन उनका पूजा करना अत्यंत लाभदायक माना जाता है।     

                             आइए जानें पूजन विधि


 भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।

 इसके बाद मंडप के नीचे मंडल बनाकर उसके मध्यभाग में मिट्टी या तांबे का कलश स्थापित 

कलश पर तांबे का पात्र रखें।

 अब इस पात्र पर वस्त्राभूषण से सुसज्जित राधा जी की मूर्ति स्थापित करें। सोने (संभव हो तो) की

 फिर राधा जी का षोडशोपचार से पूजन करें।

 राधा जी के पूजन का समय ठीक मध्याह्न का हो, इस बात का ध्यान रखें।

 पूजन के पश्चात पूरा उपवास करें या एक समय भोजन करें

 दूसरे दिन श्रद्धानुसार सुहागिनों तथा ब्राह्मणों को भोजन कराएं व उन्हें दक्षिणा दें।

  

 

कैसे करें गणेश स्थापना और नियम

       



भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। हर साल इसी तिथि को गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर हर घर, मंदिर, पंडाल में गणपति बप्पा की स्थापना की जाती है। उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान गणेश को देवताओं में प्रथम माना जाता है। साथ ही मान्यता है कि वे भक्तों के दुख-दर्द दूर करने के लिए हर साल एक बार धरती पर आते हैं। इस त्योहार में भक्त पूरी श्रद्धा के साथ भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं। घर में गणेश जी की स्थापना करते समय विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। गणेश स्थापना के नियमों का पालन करना चाहिए। आइए जानते हैं इस स्थापना के नियम।


अगर आप बाजार से गणेश जी की प्रतिमा ले रहे हैं, तो ध्यान रखें कि प्रतिमा कही से खंडित नहीं होनी चाहिए। क्योंकि सनातन धर्म में मंदिर में देवी-देवताओं की खंडित मूर्ति को रखना वर्जित है।

गणेश स्थापना से पहले घर और मंदिर की विशेष साफ-सफाई करें। माना जाता है कि गंदगी वाली जगह पर देवी-देवताओं का वास नहीं होता है। इसलिए सफाई करने के बाद गंगाजल का छिड़काव जरूर करें।

गणेश स्थापना के दौरान विशेष बात का ध्यान जरूर रखें कि प्रभु की प्रतिमा को शुभ दिशा में विराजमान करना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार, भगवान शिव के पुत्र भगवान गणेश जी  की प्रतिमा को उत्तर दिशा में स्थापित करें। गणपति बप्पा का मुख घर के मुख्य दरवाजे की ओर होना चाहिए।

इसके अलावा भगवान गणेश की प्रतिमा की पूर्व दिशा में कलश रखें और दक्षिण पूर्व में देसी घी का दीपक जलाएं।

माना जाता है कि गणेश जी को लाल रंग प्रिय है। ऐसे में गणेश स्थापना के दौरान लाल रंग के वस्त्र धारण करके पूजा-अर्चना करें और लाल रंग के फूल अर्पित करें।

 गणेश जी की स्थापना से पहले व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से पवित्रता का पालन करना चाहिए। गणपति की मूर्ति केवल उनकी कृपा को प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में शांति और समृद्धि लाने के लिए स्थापित की जाती है।  गणेश जी की स्थापना से पहले मन और घर को स्वच्छ और सकारात्मक ऊर्जा से भरना आवश्यक है।

 पूजा स्थल का चुनाव 

गणेश जी की स्थापना के लिए सही स्थान का चयन बहुत महत्वपूर्ण है।  गणपति को पूर्व दिशा या उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करना चाहिए, क्योंकि यह दिशा आध्यात्मिक उन्नति और सकारात्मकता से भरपूर मानी जाती है। पूजा स्थल पर सफाई और सुगंधित धूप, दीपक का होना आवश्यक है, जिससे वातावरण शुद्ध और पवित्र बना रहे।

3. गणपति पूजा के नियम 

 गणपति की पूजा करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

मंत्र जाप: पूजा के समय गणपति मंत्र का जाप अनिवार्य है।  “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का नियमित रूप से उच्चारण करने से भगवान गणपति की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

स्वच्छता और संयम: पूजा करते समय व्यक्ति को पूरी तरह से स्वच्छ और संयमित रहना चाहिए।  पूजा करते समय केवल शुद्ध विचार और सकारात्मक ऊर्जा ही भगवान गणपति को प्रसन्न कर सकती है।

भक्ति भाव:  भक्ति में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा है। गणपति की पूजा में गहन भक्ति और समर्पण का होना अनिवार्य है। केवल बाहरी विधियों से पूजा सफल नहीं होती, अपितु गणपति के प्रति सच्चे मन से की गई प्रार्थना ही फलदायी होती है।

आहार और संयम का पालन 

गणेश जी की स्थापना के दौरान  शुद्ध शाकाहारी भोजन का सेवन ही करना चाहिए ,  इस दौरान सात्विक आहार का ही महत्व है। यह केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन और आत्मा को भी पवित्र करता है। पूजा के समय शराब, मांसाहार और तामसिक भोजन से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

5. परिवार की सहभागिता 

गणेश जी की स्थापना में पूरे परिवार का सम्मिलित होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। गणपति पूजा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं है, बल्कि यह पूरे परिवार की समृद्धि और शांति के लिए की जाती है।  यदि पूरा परिवार एक साथ पूजा करता है तो गणपति की कृपा और भी शीघ्र प्राप्त होती है।

प्रसाद का वितरण 

 गणेश जी की स्थापना के बाद प्रसाद का वितरण करना अनिवार्य है।  प्रसाद केवल भोग नहीं, बल्कि भगवान का आशीर्वाद होता है, जिसे सभी को समान रूप से बांटना चाहिए। वह कहते हैं कि प्रसाद का वितरण परिवार और समाज में प्रेम और एकता को बढ़ावा देता है।

विसर्जन का महत्व 

गणेश जी की स्थापना के बाद विसर्जन की प्रक्रिया का विशेष महत्व है।  विसर्जन से यह संकेत मिलता है कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। गणपति की मूर्ति का विसर्जन करते समय भक्तों को शांति, प्रेम और समर्पण के भाव से इसे करना चाहिए। विसर्जन केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि भगवान के प्रति अपनी आस्था और प्रेम का पुनः स्मरण है।

8.आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग 

 गणपति की पूजा केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं की जानी चाहिए। गणपति की पूजा का वास्तविक उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति है। गणपति का ध्यान और उनकी पूजा आत्मशुद्धि और मोक्ष की ओर ले जाती है।  जो भक्त गणपति की पूजा में स्थिर मन और समर्पण से जुटता है, उसे आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही लाभ प्राप्त होते हैं।


ब्राह्मण-संत वंदना

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* बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥

सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥2॥

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भावार्थ:-पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वन्दना करता हूँ, जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को हरने वाले हैं। फिर सब गुणों की खान संत समाज को प्रेम सहित सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूँ॥2॥

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* साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥

जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥3॥

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भावार्थ:-संतों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। (कपास की डोडी नीरस होती है, संत चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है, कपास उज्ज्वल होता है, संत का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता है, इसलिए वह विशद है और कपास में गुण (तंतु) होते हैं, इसी प्रकार संत का चरित्र भी सद्गुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय है।) (जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढँक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता है, उसी प्रकार) संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढँकता है, जिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया है॥3॥


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* मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥

राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥4॥

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भावार्थ:-संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं॥4॥


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* बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी॥

हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी॥5॥

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भावार्थ:-विधि और निषेध (यह करो और यह न करो) रूपी कर्मों की कथा कलियुग के पापों को हरने वाली सूर्यतनया यमुनाजी हैं और भगवान विष्णु और शंकरजी की कथाएँ त्रिवेणी रूप से सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनंद और कल्याणों को देने वाली हैं॥5॥


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* बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥

सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥6॥

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भावार्थ:-(उस संत समाज रूपी प्रयाग में) अपने धर्म में जो अटल विश्वास है, वह अक्षयवट है और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज (परिकर) है। वह (संत समाज रूपी प्रयागराज) सब देशों में, सब समय सभी को सहज ही में प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करने से क्लेशों को नष्ट करने वाला है॥6॥


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* अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देह सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥7॥

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भावार्थ:-वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है एवं तत्काल फल देने वाला है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है॥7॥



दोहा :

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* सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।

लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥2॥

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भावार्थ:-जो मनुष्य इस संत समाज रूपी तीर्थराज का प्रभाव प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- चारों फल पा जाते हैं॥2॥



चौपाई :

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* मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥

सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई॥1॥

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भावार्थ:-इस तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल ऐसा देखने में आता है कि कौए कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस। यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है॥1॥


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* बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥

जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥2॥

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भावार्थ:-वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी ने अपने-अपने मुखों से अपनी होनी (जीवन का वृत्तांत) कही है। जल में रहने वाले, जमीन पर चलने वाले और आकाश में विचरने वाले नाना प्रकार के जड़-चेतन जितने जीव इस जगत में हैं॥2॥


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* मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥

सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥3॥

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भावार्थ:-उनमें से जिसने जिस समय जहाँ कहीं भी जिस किसी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पाई है, सो सब सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिए। वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है॥3॥


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* बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥

सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥4॥

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भावार्थ:-सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री रामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल है॥4॥


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* सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥

बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥5॥

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भावार्थ:-दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुंदर सोना बन जाता है), किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं। (अर्थात्‌ जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।)॥5॥


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* बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥

सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥6॥

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भावार्थ:-ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी संत महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है, वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचने वाले से मणियों के गुण समूह नहीं कहे जा सकते॥6॥



दोहा :

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* बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।

अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥3 (क)॥

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भावार्थ:-मैं संतों को प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! जैसे अंजलि में रखे हुए सुंदर फूल (जिस हाथ ने फूलों को तोड़ा और जिसने उनको रखा उन) दोनों ही हाथों को समान रूप से सुगंधित करते हैं (वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं।)॥3 (क)॥


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* संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।

बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु॥ 3 (ख)

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भावार्थ:-संत सरल हृदय और जगत के हितकारी होते हैं, उनके ऐसे स्वभाव और स्नेह को जानकर मैं विनय करता हूँ, मेरी इस बाल-विनय को सुनकर कृपा करके श्री रामजी के चरणों में मुझे प्रीति दें॥ 3 (ख)॥

गुरु वंदना



                                              


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* बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।

महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥5॥

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भावार्थ:-

मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं॥5॥


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चौपाई :

* बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥

अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥1॥

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भावार्थ:-

मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है॥1॥


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* सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥

जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥2॥

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भावार्थ:-

वह रज सुकृति (पुण्यवान्‌ पुरुष) रूपी शिवजी के शरीर पर सुशोभित निर्मल विभूति है और सुंदर कल्याण और आनन्द की जननी है, भक्त के मन रूपी सुंदर दर्पण के मैल को दूर करने वाली और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है॥2॥


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* श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥3॥

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भावार्थ:-

श्री गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला है, वह जिसके हृदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य हैं॥3॥


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* उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥

सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥4॥

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भावार्थ:-

उसके हृदय में आते ही हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं और संसार रूपी रात्रि के दोष-दुःख मिट जाते हैं एवं श्री रामचरित्र रूपी मणि और माणिक्य, गुप्त और प्रकट जहाँ जो जिस खान में है, सब दिखाई पड़ने लगते हैं-॥4॥



दोहा :

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* जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।

कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥1॥

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भावार्थ:-

जैसे सिद्धांजन को नेत्रों में लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर कौतुक से ही बहुत सी खानें देखते हैं॥1॥


चौपाई :

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* गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥

तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥1॥

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भावार्थ:-

श्री गुरु महाराज के चरणों की रज कोमल और सुंदर नयनामृत अंजन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करने वाला है। उस अंजन से विवेक रूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसाररूपी बंधन से छुड़ाने वाले श्री रामचरित्र का वर्णन करता हूँ॥1॥





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